किसी समस्या का सबसे न्याय संगत या ईमानदार समाधान/सुझाव वो होता है जो आप न सिर्फ दूसरों को दें बल्कि खुद पर भी आजमाएं ।
हमारी फिल्म के नायक हिरायामा यहीं पर मार खा जाते हैं ।
हिरायामा के पास अक्सर उसके दोस्त राय लेने आते हैं , चाहे वो शादी- विवाह को लेकर हो, पारिवारिक मुद्दे हो या कोई रोमांटिक मैटर । और हिरायामा बहुत ही सरलता और अंतर्दृष्टि से उन्हे अच्छे सुझाव भी देते रहते हैं लेकिन बात जब खुद के परिवार की आती है तब वो फिसल जाते हैं ।
एक दिन हिरायामा का मित्र मिकामी उसके पास अपनी एक समस्या लेकर आता है । मिकामी की बेटी घर छोड़ चुकी है क्यूंकी वो अरैंज मैरेज नहीं करना चाहती । वो चाहता है की हिरायामा उसकी बेटी फुमिकों को समझाये की वो उसकी बात मान ले । फुमिकों को एक संगीतकर से प्रेम है और वो उसी से विवाह करना चाहती है ।
एक दिन ऑफिस में हिरायामा से मिलने एक लड़का तानिगुची उसकी सेत्सुकों लड़की का हाथ मांगने आता है । हिरायामा इस बात से नाराज़ होता है उसकी बेटी कैसे उससे बिना पूछे विवाह के बारे में सोच सकती है । वो उसका बाहर निकालना बंद कर देता है।
एक दिन सेत्सुकों की एक मित्र यूकीको हिरायामा को मिल कर उसकी राय जानना चाहती है। वो अपनी मनपसंद के लड़के से शादी करना चाहती पर उसके मटा पिता राज़ी नहीं है । इस पर हिरायामा कहता है की उसे निश्चय ही अपनी इच्छा से शादी करनी करनी चाहिए न की किसी और की । लेकिन ये एक प्लान होता है जो यूकीको और सेत्सुकों ने रचा होता है। यूकीको अपना नाम लेकर सेत्सुकों के बारे मे राय जानना चाहती थी । वो सेत्सुकों को जा कर बता देती है की उसके पिता राज़ी हैं ।
जहां पूरा परिवार एक तरफ है, हिरायामा उस चाल के उपरांत भी शादी को लेकर नाखुश है । शादी में भी वो नाखुश ही नज़र आता है। शादी कर के बेटी दूसरे शहर को चली जाती है ।
उस शादी के बाद मिकमी हिरायामा को बताता है की उसने अपनी बेटी के प्रेम विवाह को लेकर सहमत है ।
लेकिन पिता तो आखिर पिता ही होता है । अंततः हिरायामा अपनी बेटी से मिलने निकाल पड़ता है।
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