
The Only Son 一人息子, Hitori Musuko (1936)
Tragedy in Life starts with the bondage of Parent and Child.
निराशा – जब एक आदमी बहुत कुछ करना चाहता है , पाना चाहता है , इसके लिए घर से दूर भी जाता है, परिश्रम भी करता है, सब कुछ त्याग भी करता है … लेकिन इन सब के उपरांत जब वो कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाता है और स्वयं को उस स्थान पर पाता हैं जहां उसे लगता है कि उसके जीवन का एक पड़ाव समाप्त हो चुका होता है । ऐसी परिस्थिति में मनुष्य चाहे कितना भी महत्वाकांक्षी, आत्मविश्वासी अथवा साहसी क्यूँ न रहा हो वो अपने आप को निराश ही पाता है ।
बात 1923 कि है, 13 वर्षीय र्योसूके अपनी निर्धन मजदूर माँ नोनोमिया के साथ जापान के सिनशु गाँव में रहता है। प्राथमिक शिक्षा समाप्त हो चुकी है और उसके साथी आगे पढ़ने के लिए टोक्यो जा रहे हैं, र्योशूके भी जाना चाहता है । उसकी माँ असमर्थ है लेकिन अपने बेटे को दुःखी और उदास पा उसे टोक्यो भेजने का निर्णय लेती है। र्योसूके माँ से कहता है कि वो उसे अवश्य एक दिन एक बड़ा आदमी बन कर दिखाएगा ।
13 वर्ष बीठ चुके है, र्योसूके भी अब 26 वर्ष का हो चुका है, उसकी माँ उससे मिलने टोक्यो जाती है। वहाँ जाने पर पता चलता है कि र्योसूके विवाह कर चुका है और उसका एक नन्हा बच्चा भी है। र्योसूके एक नाइट स्कूल में शिक्षक है और एक अत्यंत साधारण जीवन व्यतीत कर रहा होता है। माँ को टोक्यो घूमा-फिरा कर र्योसूके बहुत प्रसन्न है लेकिन स्वयं को भीतर से दुःखी भी पाता है।
एक दिन वो माँ से पूछता है कि क्या वो उससे निराश है क्यूंकी वो अपने जीवन मैं कुछ नहीं कर पाया । वो स्वयं की वर्तमान अवस्था से असंतुष्ट है, काश वो टोक्यो न आया होता और घर पर ही रहता, उसने माँ को व्यर्थ ही कष्ट भोगने दिया, उसे लगता है कि वो कुछ बड़ा नहीं कर पाया । उसके जीवन का एक पड़ाव बिना कुछ किये-पाये ही समाप्त हो चुका है।
रात को दोनों सो नहीं पाते हैं। र्योसूके माँ से कहता है कि उसने पूरा प्रयत्न किया लेकिन वो कुछ नहीं कर सका। टोक्यो मैं जीना कठिन है । उसकी माँ कहती है उसे इतनी शीघ्र हार नहीं माननी चाहिए क्यूंकी उसने स्वयं कभी हार नहीं मानी , अकेली होकर भी उसे कॉलेज पढ़ने के लिए टोक्यो भेजा । भले ही कुछ ही लोग टोक्यो में सफल होते होंगे लेकिन सफल होते हैं। उसे अपने बेटे की हार मान लेने की अभिवृति पसंद नहीं आती है । उसने कष्ट झेले ताकि उसका बेटा सफल हो सके । माँ ने बताया कि वो अपना घर-जमीन सब कुछ र्योसूके के लिए बेच चुकी है और स्वयं फ़ैक्टरि डोरमेट्री में रहती है उसके लिए ये सब वस्तुए कोई महत्व नहीं रखती लेकिन उसे र्योसूके का हार मान लेने वाला रवैया पसंद नहीं है ।
र्योसूके कि पत्नी अपना किमोनो बेच देती है ताकि माँ को घूमने के लिए कुछ पैसे निकल आयें। तभी पड़ोस के एक बच्चे का एक्सिडेंट हो जाता है और र्योसूके वो पैसे उस बच्चे कि गरीब माँ को इलाज के लिए थमा देता है । र्योस्सुके को खेद है कि वो अपनी माँ को घूमने नहीं ले जा सका, लेकिन उसकी माँ कहती है कि अच्छा हुआ जो वो अमीर नहीं हुआ, उसको अपने बेटे पर गर्व होता है कि उसमें इतनी संवेदनशीलता है ।
माँ गाँव लौट जाती है । र्योसूके अपनी पत्नी को बताता है कि वो नहीं चाहता था कि माँ टोक्यो आए और उन्हें इस अवस्था में देखे। क्यूंकी वो स्वयं भी नहीं चाहता कि उसका भी बेटा केवल एक नाईट स्कूल का टीचर ही बना रह जाये । वो पत्नी से कहता है कि वो और पढ़ेगा और पुनः अपनी माँ को टोक्यो बुलाएगा । वो चाहता है कि उसका बेटा कुछ बड़ा करे।
गाँव लौट कर माँ फ़ैक्टरी में अपने सहकर्मी से कहती है कि उसका बेटा एक बड़ा आदमी बन गया है। लेकिन अंततः वो स्वयं को दुःखी ही पाती है ।
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