विदुर शुहे होरिकावा एक अध्यापक हैं, उनका एक 10 वर्षीय पुत्र भी है जो उनके साथ ही रहता है। स्कूल में एक पिकनिक के दौरान एक छात्र की मृत्यु हो जाती है , चूंकि उस पिकनिक का दायित्व शुहे पर था वो त्यागपत्र दे देता है ।
पिता अपने बेटे को एक बोर्डिंग स्कूल में भर्ती करवा कर स्वयं टोक्यो चले जाते हैं।
समय बीतता है र्योहे 25 वर्ष का हो चुका है और अब वो भी एक अध्यापक है। एक बार जब वो पिता से मिलने आता है तो उनके साथ ही रहने की इच्छा व्यक्त करता है । पिता नकार देते हैं और उसे अपने भविष्य और काम पर ध्यान देने को कहते हैं।
र्योहे 10 दिन की छुट्टी पर टोक्यो आया हुआ है, पिता चाहते हैं की र्योहे उनके मित्र हिराटा की पुत्री फुमिकों से विवाह कर ले। एक रात जब पिता जब अपने पुराने छात्रों की reunion से लौटते है तो उनको हृदयाघात होता है। हॉस्पिटल में पिता देहांत पूर्व फुमिकों पर र्योहे की देख-रेख का दायित्व छोड़ जाते हैं।
र्योहे विवाह कर फुमिकों के साथ ट्रेन से लौट रहा होता है तो फुमिकों अपने पिता और भाई को याद कर रही होती है, उसको उदास देख कर र्योहे कहता है कि वो उन दोनों को भी अपने साथ रहने बुला लें तो कितना अच्छा हो, सब एक साथ रहें तो कितना अच्छा रहेगा। फुमिकों हामी भरती है । भले ही पिता के साथ वो न रह पाया हो लेकिन अपने नए परिवार के साथ रहने कि आशा में र्योहे अपने शहर कि और बढ़ता है ।

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