कुछ लोगों की उपस्थिती मात्र ही आप को ऊर्जा एवं सुख से भर देती है, पिता के देहांत के एक वर्ष पश्चात टोडा परिवार के दूसरे बेटे शोजीरों का आगमन भी माँ और बहन के लिए कुछ ऐसा ही था।
सम्पन्न टोडा परिवार के मुखिया शीनतारों टोडा का उनके 69 वें जन्मदिवस की संध्या को ही निधन हो जाता है। मृत्यु के बाद जब पता चलता है कि पिता उधारी छोड़ कर गए हैं तब सारे भाई-बहन उनकी संपाति बेचने का निर्णय लेते हैं। केवल एक जर्जर घर रह जाता है।
दूसरे नंबर का भाई शोजीरों काम के सिलसिले में चाइना चला जाता है । माता और छोटी बहन का दायित्व अन्य भाई-बहनों पर आता है, जो बारी-बारी उनका भार वहन करते हैं। लेकिन सब अनमने से ही होते हैं कोई भी वृद्ध माँ और छोटी बहन कि देख-रेख ढंग से नहीं करता , सबके लिए वो दोनों एक आफत और बोझ ही होते है। अंततः दोनों माँ-बेटी उस बचे हुए पुराने घर में रहने चली जाती हैं।
पिता कि बरसी पर जब शोजीरों चीन से लौटता है तब माँ और बहन कि अवस्था देख आग बबूला हो उठता है और सब भाई बहनों कि ठीक से खिंचाई करता है और उन्हें घर से निकल जाने को कहता है।
शोजीरों माँ और बहन को अपने साथ चीन ले जाने का निर्णय लेता है जिसके लिए माँ-बहन दोनों मान जाती है। शोजीरों अपनी बहन को शादी के लिए मना लेता है और बहन भी शोजीरों को अपनी सखी से शादी के लिए मना लेती है।

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